Wednesday, April 12, 2017

जीवनोपयोग health se Judi kuch bate

*जीवनोपयोग*

*1. सुबह उठ कर कैसा पानी पीना चाहिए*

    उत्तर -     हल्का गर्म

*2.  पानी पीने का क्या तरीका होता है*

    उत्तर -    सिप सिप करके व नीचे बैठ कर

*3. खाना कितनी बार चबाना चाहिए*

     उत्तर. -    32 बार

*4.  पेट भर कर खाना कब खाना चाहिए*

     उत्तर. -     सुबह

*5.  सुबह का नाश्ता कब तक खा लेना चाहिए*

     उत्तर. -    सूरज निकलने के ढाई घण्टे तक

*6.  सुबह खाने के साथ क्या पीना चाहिए*
   
     उत्तर. -     जूस

*7.  दोपहर को खाने के साथ क्या पीना चाहिए*

    उत्तर. -     लस्सी / छाछ

*8.  रात को खाने के साथ क्या पीना चाहिए*

    उत्तर. -     दूध

*9.  खट्टे फल किस समय नही खाने चाहिए*

    उत्तर. -     रात को

*10. आईसक्रीम कब खानी चाहिए*

       उत्तर. -      कभी नही

*11. फ्रिज़ से निकाली हुई चीज कितनी देर बाद*
      *खानी चाहिए*

      उत्तर. -    1 घण्टे बाद

*12. क्या कोल्ड ड्रिंक पीना चाहिए*

       उत्तर. -      नहीं

*13.  बना हुआ खाना कितनी देर बाद तक खा*
      *लेना चाहिए*

      उत्तर. -     40 मिनट

*14.  रात को कितना खाना खाना चाहिए*

       उत्तर. -    न के बराबर

*15.  रात का खाना किस समय कर लेना चाहिए*

      उत्तर. -     सूरज छिपने से पहले

*16. पानी खाना खाने से कितने समय पहले*
     *पी सकते हैं*

      उत्तर. -     48 मिनट

*17.  क्या रात को लस्सी पी सकते हैं*

     उत्तर. -     नही

*18.  सुबह खाने के बाद क्या करना चाहिए*

       उत्तर. -     काम

*19. दोपहर को खाना खाने के बाद क्या करना*
       *चाहिए*

       उत्तर. -     आराम

*20. रात को खाना खाने के बाद क्या करना*
     *चाहिए*

      उत्तर. -    500 कदम चलना चाहिए

*21. खाना खाने के बाद हमेशा क्या करना*
      चाहिए

      उत्तर. -     वज्रासन

*22. खाना खाने के बाद वज्रासन कितनी देर*
      *करना चाहिए.*
   
      उत्तर. -     5 -10 मिनट

*23.  सुबह उठ कर आखों मे क्या डालना चाहिए*

      उत्तर. -     मुंह की लार

*24.  रात को किस समय तक सो जाना चाहिए*

      उत्तर. -     9 - 10 बजे तक

*25. तीन जहर के नाम बताओ*

      उत्तर.-    चीनी , मैदा , सफेद नमक

*26. दोपहर को सब्जी मे क्या डाल कर खाना*
      *चाहिए*

      उत्तर. -     अजवायन

*27.  क्या रात को सलाद खानी चाहिए*

      उत्तर. -     नहीं

*28. खाना हमेशा कैसे खाना चाहिए*

      उत्तर. -     नीचे बैठकर व खूब चबाकर

*29. चाय कब पीनी चाहिए*

      उत्तर. -     कभी नहीं

*30. दूध मे क्या डाल कर पीना चाहिए*

      उत्तर. -    हल्दी

*31.  दूध में हल्दी डालकर क्यों पीनी चाहिए*

      उत्तर. -    कैंसर ना हो इसलिए

*32. कौन सी चिकित्सा पद्धति ठीक है*

      उत्तर. -   आयुर्वेद

*33. सोने के बर्तन का पानी कब पीना चाहिए*

      उत्तर. -   अक्टूबर से मार्च (सर्दियों मे)

*34. ताम्बे के बर्तन का पानी कब पीना चाहिए*

      उत्तर. -    जून से सितम्बर(वर्षा ऋतु)

*35. मिट्टी के घड़े का पानी कब पीना चाहिए*

      उत्तर. -  मार्च से जून (गर्मियों में)

*36. सुबह का पानी कितना पीना चाहिए*

      उत्तर. -  कम से कम 2 - 3 गिलास

*37. सुबह कब उठना चाहिए*

       उत्तर. -  सूरज निकलने से डेढ़ घण्टा पहले

Monday, April 10, 2017

॥भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय के कारण॥ ॥आधुनिक भारत में जिस नव राष्ट्रवाद का उदय हुआ

भारतीय राष्ट्रवाद : परिचर्चा- 2
॥भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय के कारण॥
॥आधुनिक भारत में जिस नव राष्ट्रवाद का उदय हुआ 

यद्यपि वह स्वरूप से पश्चिमी वेशभूषा से युक्त था परंतु उसकी प्रकृति विशुद्ध भारतीय थी और उसका प्रेरणास्रोत भारत का प्राचीन वैदिक साहित्य था॥

भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय व विकास की प्रक्रिया स्वरूप से बहुआयामी रही है यह पश्चिमी राष्ट्रवाद से प्रभावित होने के बावजूद भी उसके स्वरूप और प्रकृति से भिन्न है। किन्तु भारत में राष्ट्रवाद के बारे में एक भ्रम और अनिश्चयता की स्थिति भी सदा से बनी हुई है उसका कारण है शैक्षिक पाठ्यक्रम के माध्यम से राष्ट्रवाद के संदर्भ में भारतीय राजनैतिक विचारों के विमर्श का अभाव और पाठ्यपुस्तकों में जबरदस्ती थोपी गई पश्चिमी उपनिवेशवादी राजनैतिक विचारों का प्रभाव। भारत में अंग्रेजों के आने से पहले देश में ऐसी सामाजिक संरचना थी जो पूर्व मध्यकालीन यूरोपीय समाजों से आर्थिक दृष्टि से भिन्न थी। भारत विविध भाषा-भाषी और अनेक धर्मों के अनुयायियों वाले विशाल जनसंख्या का देश है। सामाजिक दृष्टि से देश की जनसंख्या विभिन्न जातियों और उपजातियों में विभाजित रही है। स्वयं हिन्दू समाज में कितने ही प्रकार के दर्शन और पूजा पद्धतियाँ सम्मिलित हैं जिनके कारण वह अनेक सामाजिक और धार्मिक वर्गों में बँटा हुआ दिखाई देता है। विशाल आकार के कारण भारत की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक संरचना तथा राष्ट्रीयता के विचारों का उदय यहां पर पश्चिमी देशों की तरह नहीं हुआ है।
किंतु अंग्रेज प्रशासकों द्वारा ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का अवलम्बन करते हुए उनका मूल्यांकन अगडी और पिछड़ी जातियों के रूप में विभाजित उपसमाजों के रूप में किया गया। कुछ भ्रामक धर्मशास्त्र की मान्यताओं के आधार पर अगड़ी जातियों को शोषक और पिछड़ी जातियों को शोषित मान लिया गया। इसी प्रकार धर्म के क्षेत्र में भी दरार डालने के मकसद से ‘अल्प संख्यक’ की अवधारणा से भारत के विभिन्न धर्मों के मध्य विभेद की नीति पैदा की गई और उनमें यह विचार थोपा गया कि बहुसंख्यक समुदाय उन पर सदा जुल्म और अत्याचार करते आए हैं इसलिए उन्हें सरकारी आश्रय की जरूरत है।
इसी कारण सर जॉन स्ट्रेची ने भारत की विभिन्नताओं को पश्चिमी राष्ट्रवाद के नजरिए से देखते हुए कहा है कि ” भारतवर्ष न कभी था और न है और न उसमें यूरोपीय विचारों के अनुसार किसी प्रकार की भौगोलिक, राजनैतिक, सामाजिक अथवा धार्मिक एकता थी, न कोई भारतीय राष्ट्र और न कोई भारतीय ही था जिसके विषय में हम बहुत अधिक सुनते हैं।“ इस सम्बन्ध में सर जॉन शिले का कहना है कि ”यह विचार कि भारतवर्ष एक राष्ट्र है, उस मूल पर आधारित है जिसको राजनीतिक शास्त्र स्वीकार नहीं करता और दूर करने का प्रयत्न करता है। भारतवर्ष एक राजनीतिक नाम नही हैं वरन् एक भौगोलिक नाम है जिस प्रकार यूरोप या अफ्रीका।“ यानी पश्चिमी विचारकों के अनुसार भारत के भौगोलिक नक्शे को तो आप राष्ट्र कह सकते हैं किन्तु आपस में लड़ने वाली इन जातियों और उपजातियों में एक राष्ट्र होने के लक्षण कभी नहीं रहे।
राष्ट्रवाद से सम्बद्ध उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि भारत में राष्ट्रवाद के उदय और विकास के बारे में जो मान्यताएं और भ्रांतियां अंग्रेज प्रशासकों द्वारा स्थापित की गई हैं वे पश्चिमी राष्ट्रवाद की अवधारणाओं से प्रेरित हैं। वास्तविकता यह है कि भारतीय समाज की विभिन्नताओं में ही बहुलतावादी मौलिक एकता राष्ट्रवाद के रूप में सदैव जीवित रही है और इसी राष्ट्रवाद के परिणाम स्वरूप समय-समय पर राजनीतिक एकता की भावना का भी उदय होता रहा है। इतिहासकार वी.ए.स्मिथ भी यह स्वीकार करते हैं कि “वास्तव में भारतवर्ष की एकता उसकी विभिन्नताओं में ही निहित है।”
डॉ॰ आर.सी. मजूमदार ने लिखा है कि 19वीं शताब्दी मे यूरोप में जो स्वाधीनता संग्राम लड़े गए, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को काफी प्रभावित किया। फ्रांस की 1830 ई. एवं 1848 ई. की क्रान्ति ने भारतीयों में बलिदान की भावना जागृत की। इटली तथा यूनान की स्वाधीनता ने उनके उत्साह को बढाया।उस समय आयरलैण्ड भी अंग्रेजों की पराधीनता से मुक्त होने का प्रयास कर रहा था,उससे भी भारतीय जनता को पर्याप्त प्रेरणा मिली।
इटली, जर्मनी, और रुमानिया के राजनीतिक आन्दोलन, इंग्लैण्ड मे सुधार कानूनों का पारित होना एवं अमेरिका का स्वतन्त्रता संग्राम आदि कुछ समकालीन घटनाएं थीं जिन्होंने भारतीयों को अपने देश की आजादी के लिए लड़ने का साहस पैदा किया। इस प्रकार विदेशी आन्दोलनों ने भारतीयों मे देश भक्ति और देश प्रेम की भावना को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और उन्हें स्वाधीनता प्राप्त करने के संघर्ष हेतु संजीवनी प्रदान की। यह भी एक महत्त्वपूर्ण कारण है कि ब्रिटिश शासन की स्थापना से भारतीय समाज में नए विचारों तथा नई परम्पराओं को जन्म मिला है।
पर इन विचारों तथा परम्पराओं के बीच हुई क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के परिणाम स्वरूप आधुनिक भारत में जिस नव राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय विचारों का उदय हुआ उसकी प्रकृति विशुद्ध भारतीय थी, उसका अवतरण यद्यपि पश्चिमी वेशभूषा में हुआ परंतु उसके प्रेरणास्रोत भारत के प्राचीन वैदिक साहित्य और लौकिक संस्कृत साहित्य में उद्घाटित विशुद्ध भारतीय विचार थे जिसकी विस्तार से चर्चा हम आगे करेंगे।
दरअसल‚ भारत में आधुनिक राष्ट्रवादी विचारधारा का अंकुर सत्रहवीं शताब्दी के मध्य से उगने लगा था किन्तु यह धीरे-धीरे विकसित होता रहा अन्त मे 1857 ई. में इसने पूर्ण क्रान्ति का रूप धारण किया था। कुछ इतिहासकार इसे सिपाही विद्रोह की संज्ञा देते हैं जिसे भारत के देशी रियासतों की मदद से विफल कर दिया गया। पर इस विद्रोह की खासियत यह थी कि राष्ट्रवादी दलित और सवर्ण जातियों ने तथा हिन्दू और मुस्लिम धर्मानुयायियों ने अपने तमाम आपसी भेदभाव भुलाकर पहली बार ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोला था किन्तु देशी रियासतों के कुछ स्वार्थी राजाओं और सामंती शक्तियों ने अंग्रेजों का साथ दिया और क्रांतिकारियों की आजादी की लड़ाई को कुचल दिया गया।
सन् 1857 ई. की क्रान्ति की असफलता के संबंध में ‘भारत कोश’ की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है- “पटियाला, ग्वालियर एवं हैदराबाद के राजाओं ने विद्रोह को कुचलने में अंग्रेज़ों का पूरा सहयोग किया। संकट के समय लॉर्ड कैनिंग ने कहा था कि, "यदि सिन्धिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाएँ, तो मुझे कल ही भारत छोड़ना पड़ेगा"। विद्रोह दमन के पश्चात् भारतीय राजाओं को पुरस्कृत किया गया। निज़ाम को बरार का प्रान्त लौटा दिया गया और उसके ऋण माफ कर दिये गये। सिन्धिया, गायकवाड़ और राजपूत राजाओं को भी पुरस्कार मिले। ”
किन्तु देश के जिन देश भक्त क्रांतिकारी सपूतों और वीरांगनाओं ने इस आजादी की लड़ाई में वीरतापूर्वक लड़ते हुए अपने प्राण न्योछावर किए उनमें सिपाही विद्रोह का मुख्य नायक मंगल पांडे, बुन्देलखण्ड की महारानी झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के नाम सर्वोपरि हैं। इस संग्राम में नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे को बन्दी बनाकर फ़ाँसी दे दी गई। दिल्ली पर जब अंग्रेज़ों का पुन: अधिकार हुआ, बहादुरशाह द्वितीय को बन्दी बनाकर रंगून भेज दिया गया, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई। उसके दो पुत्रों और पौत्रों को कर्नल हाड्सन ने बिना किसी न्यायिक जाँच के गोली से उड़ा दिया।
1857 ई. के इस विद्रोह की विफलता का एक कारण था शिक्षित वर्ग का पूर्ण रूप से इस विद्रोह के प्रति उदासीन रहना। इस विद्रोह में 'राष्ट्रीय भावना' का भी पूर्णतया अभाव था, यदि जनसामान्य में राष्ट्रीय चेतना का प्रचार –प्रसार किया होता, और विभिन्न रियासतों ने ब्रिटिश हुकुमत का साथ नहीं दिया होता तो निःसंदेह ही क्रान्ति के इस विद्रोह का परिणाम कुछ ओर ही होता। दुर्भाग्य रहा कि भारतीय समाज के सभी वर्गों का सहयोग इस 1857 के विद्रोह को नहीं मिल सका। किन्तु अंग्रेजों की इस दमनपूर्ण नीति के विरुद्ध देश की आजादी और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का जन आन्दोलन कालान्तर में थमा नहीं और भी तीव्र और विराट् हो गया जिसकी चर्चा आगामी पोस्ट में जारी रहेगी।

डा.एनी बेसेंट , स्वामी विवेकानंद , महर्षि दयानंद सरस्वती , राजा राममोहन राय

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Image may contain: 1 personभारतीय राष्ट्रवाद का पुनर्जागरण काल-3💐॥सामाजिक आन्दोलन के सूत्रधार : राजा राममोहन राय‚
महर्षि दयानन्द और स्वामी विवेकानन्द॥
डा.एनी बेसेंट , स्वामी विवेकानंद ,  महर्षि दयानंद सरस्वती , राजा राममोहन राय 🙅🙅🙅🙅🙅🙅🙅🙅🙅🙅🙅🙅🙅






पुनर्जागरण काल के राष्ट्रवादी चिन्तक जानते थे कि अपनी अज्ञानता की चिरनिद्रा में सोए हुए भारतीयों की राष्ट्रीय चेतना को जागृत करना है तो उन्हें पुनः भारत के गौरवशाली अतीत की ओर ले जाना होगा जिसके मानववादी मूल्यों में एक राष्ट्र को जागृत करने की क्षमता ही नहीं अपितु समूची मानवता को जगाने का भी सामर्थ्य है।
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सन् 1857 का विद्रोह विफल हो जाने के बाद उन्नीसवीं शताब्दी में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में भारतीय राष्ट्रवाद के दूसरे चरण की जो शुरुआत हुई उसे इतिहास जगत् में राष्ट्रीय पुनर्जागरण के काल के रूप में जाना जाता है। भारत में इस नवीन राष्ट्रवाद के जन्म के कारण जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन का संघर्ष प्रारम्भ हुआ वह विश्व में अपने आप में एक अनूठा अहिंसक आन्दोलन था जो कालान्तर में महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में लड़ा गया किन्तु इसकी पृष्ठभूमि में तत्कालीन सामाजिक तथा धार्मिक आन्दोलनों की भी बहुत बड़ी भूमिका रही थी।
इतिहासकारों का मत है कि इस समय भारत का पुनर्जागरण मुख्यतः आध्यात्मिक था। धीरे धीरे इसने राष्ट्र के राजनीतिक उद्धार के आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। इस दूसरे चरण के आन्दोलन की खासियत थी कि भारत में राजनीतिक जागृति के साथ-साथ सामाजिक तथा धार्मिक जागृति का भी सूत्रपात हुआ। भारतीय राष्ट्रीय पुनर्जागरण के इस आन्दोलन का स्वरूप यूरोपीय देशों में हुई राष्ट्रीय जागृति के आन्दोलन से सर्वथा भिन्न था। ।9वीं शताब्दी में पश्चिमी राष्ट्रवाद से प्रभावित होकर भारत में भी आधुनिक राष्ट्रवाद का जो उदय हुआ उसके मुख्य सूत्रधार थे- राजा राममोहन राय‚ महर्षि दयानन्द सरस्वती‚ स्वामी विवेकानन्द‚ महर्षि अरविन्द‚ लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक‚ महामना मदन मोहन मालवीय‚ बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय‚ महात्मा गांधी आदि राष्ट्रवादी विचारक। प्रारम्भिक दौर में इस नवोदित राष्ट्रवाद की प्रकृति अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा के कारण पश्चिमी स्वरूप की थी किन्तु जैसे-जैसे इसने राष्ट्रीय आन्दोलन की दिशा पकड़ी इसका स्वरूप भारतीय होता गया।
भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय व विकास की दृष्टि से 19 वीं शताब्दी में हुए सामाजिक तथा धार्मिक आन्दोलनों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। पिछले सैकड़ों वर्षों की पराधीनता के कारण भारतवासी अपने देश की स्वर्णिम परम्पराओं के इतिहास और उससे जुड़े बौद्धिक चिन्तन को भूला चुके थे जिसके कारण देश की सामाजिक तथा धार्मिक दशा पतन की ओर अग्रसर थी । धर्म के नाम पर समाज में अन्धविश्वास और कुप्रथाएँ पैदा हो गई थीं। इन आधुनिक राष्ट्रीय आन्दोलनों ने एक ओर जहां धर्म तथा समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया तो दूसरी ओर भारत में राष्ट्रीयता की चेतना पैदा करने में भी इन आन्दोलनों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस प्रकार के पुनर्जागरण आन्दोलनों मे ‘ब्रह्म समाज’, ‘आर्य समाज’, ‘रामकृष्ण मिशन’ एवं ‘थियोसोफिकल सोसायटी’ आदि संस्थाओं का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनके प्रवर्तक क्रमशः राजा राममोहन राय, महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, डा. एनी बेसेन्ट आदि धर्म सुधारक रहे थे। इन सुधारकों ने भारतीयों में आत्मविश्वास जागृत किया, उन्हें भारतीय संस्कृति की गौरव गरिमा का ज्ञान कराया, तथा उन्हें अपनी संस्कृति की रक्षा करने के साथ साथ स्वदेशी चिंतन अपनाने की ओर भी प्रेरित किया। राजा राममोहन राय ने उपनिषदों को आधार बनाकर ‘ब्रह्मसमाज’ की स्थापना की तथा महर्षि दयानन्द सरस्वती ने वेदों के तत्त्वज्ञान से प्रेरित होकर ‘आर्यसमाज’ की स्थापना का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। स्वामी विवेकानन्द ने ‘रामकृष्णमिशन’ के माध्यम से भारत के प्राचीन आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का जन-जन में प्रचार किया।
पुनर्जागरण काल के राष्ट्रवादी चिन्तक यह भली भांति जानते थे कि अपनी अज्ञानता की चिरनिद्रा में सोए हुए भारतीयों की राष्ट्रीय चेतना को जागृत करना है तो उन्हें पुनः भारत के गौरवशाली अतीत की ओर ले जाना होगा जिसके मानववादी मूल्यों में एक राष्ट्र को जागृत करने की क्षमता ही नहीं अपितु समूची मानवता को जगाने का भी सामर्थ्य है। इन्हीं शिवसंकल्पों से 19वीं शताब्दी में भारतीय राष्ट्रवाद को एक नया जन्म और वैचारिक स्वरूप मिला।
💐 राजा राममोहन राय 💐
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इन महान समाज सुधारकों में राजा राम मोहन राय को भारतीय राष्ट्रीयता का अग्रदूत कहा जाता है। उन्होंने समाज तथा धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करने हेतु अगस्त 1828 ई. में ‘ब्रह्म समाज ’ की स्थापना की। राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा, छुआ-छूत जातिगत भेदभाव एवं मूर्ति पूजा आदि बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। उनके प्रयासों के कारण आधुनिक भारत का निर्माण सम्भव हो सका। इसलिए राम मोहन राय को आधुनिक भारत का निर्माता भी कहा जाता है। राजा राममोहन राय ने भारतीयों के लिए राजनीतिक अधिकारों की माँग की। ब्रिटिश सरकार द्वारा 1823 ई. में प्रेस आर्डिनेन्स के द्वारा समाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। इस पर राजा राम मोहन राय ने इस आर्डिनेन्स का प्रबल विरोध किया और उसे रद्द करवाने का प्रयास किया इसके पश्चात् उन्होंने ज्यूरी एक्ट का आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया।
इतिहासकार आर.सी. मजुमदार के शब्दों में राजा राम मोहन राय “ पहले भारतीय थे जिन्होंने अपने देशवासियों की कठिनाई तथा शिकायतों को ब्रिटिश सरकार के सम्मुख प्रस्तुत किया और भारतीयों को संगठित होकर राजनीतिक आन्दोलन चलाने का मार्ग दिखलाया। उन्हें आधुनिक आन्दोलन का अग्रदूत होने का भी श्रेय दिया जा सकता है।”
💐 महर्षि दयानंद सरस्वती 💐
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राजा राममोहन राय के बाद महर्षि दयानन्द सरस्वती एक महान समाज सुधारक हुए। उन्होंने 1875 ई. में मुंबई में ’आर्य समाज’ की नींव रखी। आर्य समाज एक साथ ही धार्मिक और राष्ट्रीय नवजागरण का आन्दोलन था इसने भारत के सनातन हिन्दू धर्म को नवजीवन प्रदान किया। स्वामी दयानन्द ने न केवल हिन्दू धर्म तथा समाज मे व्याप्त बुराइयों का विरोध किया अपितु अपने देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना का संचार भी किया। उन्होंने ईसाई धर्म की कमियों पर प्रकाश डाला और हिन्दुत्त्व के महत्व का प्रतिपादन कर भारतीयों का ध्यान अपनी सभ्यता व संस्कृति की ओर आकर्षित किया। उन्होंने लुप्त होती वैदिक धर्म की श्रेष्ठता को पुन: स्थापित किया और यह बताया कि हमारी वैदिक संस्कृति विश्व की प्राचीनतम एवं महत्त्वपूर्ण संस्कृति है। उनका मानना है कि वेद ज्ञान के भण्डार हैं और वैदिक धर्म के बल पर भारत विश्व में अपनी प्रतिष्ठा फिर से स्थापित कर जगद्गुरु का गौरव पुन: प्राप्त कर सकता है।
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने ग्रन्थ ’सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा है कि “विदेशी राज्य चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो, स्वदेशी राज्य की तुलना मे कभी भी अच्छा नहीं हो सकता।“ राजनीतिक स्वतन्त्रता की प्राप्ति स्वामी दयानन्द का मुख्य उद्देश्य था। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘स्वराज’ शब्द का प्रयोग किया और अपने देशवासियों को विदेशी माल के प्रयोग के स्थान पर स्वदेशी माल के प्रयोग की प्रेरणा दी। उन्होंने सबसे पहले हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा स्वीकार किया।“ श्रीमती एनी बेसेन्ट ने लिखा है -”स्वामी दयानन्द सरस्वती पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने सबसे पहले यह नारा दिया था, कि भारत भारतीयों के लिए है।“
💐 स्वामी विवेकानंद 💐
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स्वामी विवेकानन्द ने ‘रामकृष्णमिशन’ के माध्यम से भारत के प्राचीन आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का जन-जन में प्रचार किया। विवेकानन्द भारत‚ भारतीयता और भारत की भूमि को अत्यन्त गौरव की दृष्टि से देखते थे और मानते थे कि यही वह देश है जहां तत्त्वज्ञान की किरण सबसे पहले फूटी और यहीं से वह विश्व के अन्य देशों तक पहुंची। उन्हें इस भारतराष्ट्र पर इसलिए भी गर्व था क्योंकि यह शताब्दियों से विदेशी आघात को सहकर भी अक्षय बना हुआ है। स्वामी विवेकानन्द ने यूरोप और अमेरिका में भारतीय संस्कृति का प्रचार किया। उन्होंने अंग्रेजों को यह बता दिया कि भारतीय संस्कृति पश्चिमी संस्कृति से महान है और वे बहुत कुछ भारतीय संस्कृति से सीख सकते हैं। उन्होंने भारत में सांस्कृतिक चेतना जागृत की तथा यहाँ के लोगों को सांस्कृतिक विजय प्राप्त करने की प्रेरणा दी।
स्वामी जी मानते थे कि सांस्कृतिक विजय की प्राप्ति के लिए भारत का स्वतन्त्र होना आवश्यक है। इस प्रकार उन्होंने भारतीयों की राजनीतिक स्वाधीनता का समर्थन किया जिससे राष्ट्रीय भावनाओं को असाधारण बल मिला। निवेदिता के अनुसार “स्वामी विवेकानन्द भारत का नाम लेकर जीते थे। वे मातृभूमि के अनन्य भक्त थे और उन्होंने भारतीय युवकों को उसकी वंदना करना सिखाया।”
💐 डा.एनी बेसेंट 💐
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भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में ‘थियोसोफिकल सोसाइटी’ की नेता डा. एनी बेसेन्ट का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। एनी बेसेन्ट एक विदेशी महिला थीं, किन्तु जब उन्हें भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता का ज्ञान हुआ तो उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वाधीनता की प्राप्ति हेतु आन्दोलन आरम्भ कर दिया। डा. एनी बेसेन्ट ने अपने 40 वर्ष भारत के सर्वांगीण विकास में व्यतीत किए। वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सह संस्थापिका के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने महामना मदन मोहन मालवीय जी के अनुरोध पर काशी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए आवश्यक 'सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज' की स्थापना की। एनी बेसेंट ने भारत में पुनर्जागरण हेतु शिक्षा, नारी शिक्षा, आध्यात्मिक साहित्य के सृजन एवं हिन्दूधर्म के प्रसार, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में विशेष योगदान दिया। महात्मा गांधी ने उन्हें वसंत देवी की उपाधि से विभूषित किया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि 19 वीं शताब्दी के सुधारकों ने भारतीय जनता में राष्ट्रीय जागृति उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया । उन्होंने चिरनिंद्रा में सोए हुए देशवासियों को जगाया और ऐसा वातावरण तैयार किया जिसके कारण भारत स्वतन्त्रता के लक्ष्य को प्राप्त कर सका। सामाजिक धरातल पर देखा जाए तो ये आन्दोलन स्वरूप से कम या अधिक मात्रा में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और सामाजिक समानता के लिए संघर्षात्मक जन-आंदोलन थे पर उनका चरम लक्ष्य भारतीय राष्ट्रवाद की पुनर्स्थापना था।