Wednesday, May 24, 2017

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vir: शोध : अर्थ एवं परिभाषा शोध (Research) शोध की परि...: शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित क्लास नोट्स शोध : अर्थ एवं परिभाषा   शोध (Research) •      शोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का न...

शोध : -अर्थ एवं परिभाषा शोध (Research) शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित क्लास नोट्स. शोध प्रबंध की रूपरेखा.संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण (Survey of related literature



शोध की परिभाषा, प्रकार,चरण पर आधारित क्लास नोट्स

शोध : अर्थ एवं परिभाषा  

शोध (Research)

•      शोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का नाम है जिसमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुद्धि से उसका अवलोकन- विश्‌लेषण करके नए तथ्यों या सिद्धांतों का उद्‌घाटन किया जाता है।

•      रैडमैन और मोरी ने अपनी किताब  “दि रोमांस ऑफ रिसर्च” में शोध का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है, कि नवीन ज्ञान की प्राप्ति के व्यवस्थित प्रयत्न को हम शोध कहते हैं।

•      एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी ऑफ करेंट इंग्लिश के अनुसार- किसी भी ज्ञान की शाखा में नवीन तथ्यों की खोज के लिए सावधानीपूर्वक किए गए अन्वेषण या जांच- पड़ताल को शोध की संज्ञा दी जाती है।

•      स्पार और स्वेन्सन ने शोध को परिभाषित करते हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि कोई भी विद्वतापूर्ण शोध ही सत्य के लिए, तथ्यों के लिए, निश्चितताओं के लिए अन्चेषण है। 

•      वहीं लुण्डबर्ग ने शोध को परिभाषित करते हुए लिखा है, कि अवलोकित सामग्री का संभावित वर्गीकरण, साधारणीकरण एवं सत्यापन करते हुए पर्याप्त कर्म विषयक और व्यवस्थित पद्धति है।

शोध के अंग

·       ज्ञान क्षेत्र की किसी समस्या को   सुलझाने की प्रेरणा

·        प्रासंगिक तथ्यों का संकलन

·       . विवेकपूर्ण विश्लेषण और अध्ययन

·       परिणाम स्वरूप निर्णय 

शोध का महत्त्व

•      शोध मानव ज्ञान को दिशा प्रदान करता है तथा ज्ञान भंडार को विकसित एवं परिमार्जित करता है।  

•शोधसे व्यावहारिक समस्याओं का समाधान होता है।                                                                 

•      शोध से व्यक्तित्व का बौद्धिक विकास होता है                                                                     

•      शोध सामाजिक विकास का सहायक है                                                                               

•       शोध जिज्ञासा मूल प्रवृत्ति   (Curiosity Instinct) की संतुष्टि करता है   

•      शोध अनेक नवीन कार्य विधियों व उत्पादों को विकसित करता है                                               

•      शोध पूर्वाग्रहों के निदान और निवारण में सहायक है                                                                 

•       शोध ज्ञान के विविध पक्षों में गहनता और सूक्ष्मता प्रदान करता है।

शोध करने हेतु प्रयोग की जाने वाली पद्धतियाँ

·       सर्वेक्षण पद्धति (Survey method)

·         आलोचनात्मक पद्धति (Critical Method):

·        समस्यामूलक पद्धति (Problem based method)

·        तुलनात्मक पद्धति (Comparative method)

·       वर्गीय अध्ययण पद्धति (Class based method)

·       क्षेत्रीय अध्ययन पद्धति (Regional method)

·       आगमन(induction)-

·       निगमन (Deduction)  पद्धति

आलोचनात्मक पद्धति (Critical Method)

·       काव्यशास्त्रीय पद्धति  (aesthetic/poetics method)

·       समाजशास्त्रीय पद्धति (Sociological method)

·        भाषावैज्ञानिक पद्धति  (Linguistic method)

·       शैली वैज्ञानिक पद्धति (Stylistic method)

·       मनोवैज्ञानिक पद्धति (Psychological method)

शोध के प्रकार

उपयोग के आधार पर

1. विशुद्ध / मूल शोध    (Pure / fundamental Research)

2. प्रायोगिक /प्रयुक्त या क्रियाशील शोध (Applied Research)

काल के आधार पर

·       ऎतिहासिक शोध (Historical Research)

·        वर्णनात्मक / विवरणात्मक शोध  (Descriptive Research)

शोध के कुछ मुख्य प्रकार

1. वर्णनात्मक शोध-  शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण नहीं होता। सर्वेक्षण पद्धति का प्रयोग होता है। वर्तमान समय का वर्णन होता है। मूल प्रश्न होता है: “क्या है?”

2. विश्लेषणात्मक शोध (Analytical Research) – शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण होता है। शोधकर्ता पहले से उपलब्ध सूचनाओं व तथ्यों का अध्ययन करता है।

3. विशुद्ध / मूल शोध  - इसमें सिद्धांत (Theory) निर्माण होता है जो ज्ञान का विस्तार करता है। गणित तथा मूल विज्ञान के शोध।

4. प्रायोगिक / प्रयुक्त शोध (Applied Research): समस्यामूलक पद्धति का उपयोग होता है। किसी सामाजिक या व्यावहारिक समस्या का समाधान होता है। इसमें विशुद्ध शोध से सहायता ली जाती है।

5. मात्रात्मक शोध (Quantitative Research):  इस शोध में चरों (variables) का संख्या या मात्रा के आधार पर विश्लेषण किया जाता है।

6. गुणात्मक शोध (qualitative Research) :  इस शोध में चरों (variables) का उनके गुणों के आधार पर विश्लेषण  किया जाता है।

7. सैद्धांतिक शोध (Theoretical Research):  सिद्धांत निर्माण और विकास पुस्तकालय शोध या उपलब्ध डाटा के आधार पर किया जाता है।

8. आनुभविक शोध (Empirical Research):   इस शोध के तीन प्रकार हैं –

         क) प्रेक्षण (Observation) 

         ख) सहसंबंधात्मक (Correlational)

          ग) प्रयोगात्मक (Experimental)

9. अप्रयोगात्मक शोध (Non-Experimental Research) –वर्णनात्मक शोध  के समान

10.  ऎतिहासिक शोध (Historical Research):  इतिहास को ध्यान में रख कर शोध होता है। मूल प्रश्न होता है: “क्या था?”

11.  नैदानिक शोध (Diagnostic / Clinical Research): समस्याओं का पता लगाने के लिए किया जाता है।

शोध प्रबंध की रूपरेखा

·       सही शीर्षक का चुनाव विषय वस्तु को ध्यान में रख कर किया जाए।

·       शीर्षक ऎसा हो जिससे शोध निबंध का उद्देश्य अच्छी तरह से स्पष्ट हो रहा हो।

·       शीर्षक न तो अधिक लंबा ना ही अधिक छोटा हो।

·       शीर्षक में निबंध में उपयोग किए गए शब्दों का ही जहाँ तक हो सके उपयोग हॊ।

·       शीर्षक भ्रामक न हो।

·       शीर्षक को रोचक अथवा आकर्षक बनाने का प्रयास होना चाहिए।

·       शीर्षक का चुनाव करते समय शोध प्रश्न को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।



शोध समस्या का निर्माण  चरण 

(Formulation of research problem)

 समस्या का सामान्य व व्यापक कथन (Statement of the problem in a general way)

समस्या की प्रकृति को समझना  (Understanding the nature of the problem)

संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण  (Surveying the related literature)

परिचर्चा के द्वारा विचारों का विकास  (Developing the Ideas through discussion)

 शोध समस्या का पुनर्लेखन  (Rephrasing the research problem)

संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण

(Survey of related literature)

संबंधित साहित्य के सर्वेक्षण से तात्पर्य उस अध्ययन से है जो शोध समस्या के चयन के पहले अथवा बाद में उस समस्या पर पूर्व में किए गए शोध कार्यों, विचारों, सिद्धांतों, कार्यविधियों, तकनीक, शोध के दौरान होने वाली समस्याओं आदि के बारे में जानने के लिए किया जाता है।

संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण मुख्यत: दो प्रकार से किया जाता है:

1.    प्रारंभिक साहित्य सर्वेक्षण (Preliminary survey of literature)-प्रारंभिक साहित्य सर्वेक्षण शोध कार्य प्रारंभ करने के पहले शोध समस्या के चयन तथा उसे परिभाषित करने के लिए किया जाता है। इस साहित्य सर्वेक्षण का एक प्रमुख उद्देश्य यह पता करना होता है कि आगे शोध में कौन-कौन सहायक संसाधन होंगे।  

2.    व्यापक साहित्य सर्वेक्षण (Broad survey of literature)-व्यापक साहित्य सर्वेक्षण शोध प्रक्रिया का एक चरण होता है। इसमें संबंधित साहित्य का व्यापक अध्ययन किया जाता है। संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण शोध का प्रारूप के निर्माण तथा डाटा/तथ्य संकलन के कार्य के पहले किया जाता



साहित्य सर्वेक्षण के स्रोत

·       पाठ्य पुस्तक और अन्य ग्रंथ

·       शोध पत्र

·       सम्मेलन / सेमिनार में पढ़े गए आलेख

·       शोध प्रबंध (Theses and Dissertations)

·       पत्रिकाएँ एवं समाचार पत्र

·       इंटरनेट

·       ऑडियो-विडियो

·       साक्षात्कार (Interviews)

·       हस्तलेख अथवा अप्रकाशित पांडुलिपि

परिकल्पना Hypothesis

जब शोधकर्ता किसी समस्या का चयन कर लेता है तो वह उसका एक अस्थायी समाधान (Tentative solution) एक जाँचनीय प्रस्ताव (Testable proposition) के रूप में करता है। इस जाँचनीय प्रस्ताव को तकनीकी भाषा में परिकल्पना/प्राक्‍कल्पना कहते हैं। इस तरह परिकल्पना / प्राकल्पना किसी शोध समस्या का एक प्रस्तावित जाँचनीय उत्तर होती है।

किसी घटना की व्याख्या करने वाला कोई सुझाव या अलग-अलग प्रतीत होने वाली बहुत सी घटनाओं को के आपसी सम्बन्ध की व्याख्या करने वाला कोई तर्कपूर्ण सुझाव परिकल्पना (hypothesis) कहलाता है। वैज्ञानिक विधि के नियमानुसार आवश्यक है कि कोई भी परिकल्पना परीक्षणीय होनी चाहिये।

सामान्य व्यवहार में, परिकल्पना का मतलब किसी अस्थायी विचार (provisional idea) से होता है जिसके गुणागुण (merit) अभी सुनिश्चित नहीं हो पाये हों। आमतौर पर वैज्ञानिक परिकल्पनायें गणितीय माडल के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। जो परिकल्पनायें अच्छी तरह परखने के बाद सुस्थापित (well established) हो जातीं हैं, उनको सिद्धान्त कहा जाता है।

परिकल्पना की विशेषताएँ

·       परिकल्पना को जाँचनीय होना चाहिए।  

·       बनाई गई परिकल्पना का तालमेल (harmony) अध्ययन के क्षेत्र की अन्य    परिकल्पनाओं के साथ होना चाहिए।

·       परिकल्पना को मितव्ययी (parsimonious) होना चाहिए ।  

·       परिकल्पना में तार्किक पूर्णता (logical unity) और व्यापकता का गुण होना चाहिए।  

·       परिकल्पना को मितव्ययी (parsimonious) होना चाहिए।  

·       परिकल्पना को अध्ययन क्षेत्र के मौजूदा सिद्धांतों एवं तथ्यों से संबंधित होना चाहिए ।

·       परिकल्पना को संप्रत्यात्मक (conceptual) रूप से स्पष्ट होना चाहिए।

·       परिकल्पना को अध्ययन क्षेत्र के मौजूदा सिद्धांतों एवं तथ्यों से संबंधित होना चाहिए ।

·       परिकल्पना से अधिक से अधिक अनुमिति (deductions) किया जाना संभव होना चाहिए तथा उसका स्वरूप न तो बहुत अधिक सामान्य होना चाहिए (general) और न ही बहुत अधिक विशिष्ट (specific)।

·       परिकल्पना को संप्रत्यात्मक (conceptual) रूप से स्पष्ट होना चाहिए: इसका अर्थ यह है कि परिकल्पना में इस्तेमाल किए गए संप्रत्यय /अवधारणाएँ (concepts) वस्तुनिष्ठ (objective) ढंग से परिभाषित होनी चाहिए।

परिकल्पना निर्माण के स्रोत

       i.            व्यक्तिगत अनुभव

     ii.            पहले किए शोध के परिणाम

  iii.            पुस्तकें, शोध पत्रिकाएँ, शोध सार आदि

   iv.            उपलब्ध सिद्धांत

     v.            निपुण विद्वानों के निर्देशन में


शोध प्रक्रिया के प्रमुख चरण

1.    अनुसंधान समस्या का निर्माण

2.    संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण

3.    परिकल्पना/प्राकल्पना (Hypothesis) का निर्माण

4.    शोध की रूपरेखा/शोध प्रारूप (Research Design) तैयार करना

5.    आँकड़ों का संकलन / तथ्यों का संग्रह

6.    आँकड़ो / तथ्यों का विश्‍लेषण

7.    प्राकल्पना की जाँच

8.    सामान्यीकरण एवं व्याख्या

9.    शोध प्रतिवेदन तैयार करना

Friday, April 28, 2017

गाय के घी के अन्य महत्वपूर्ण उपयोग : fayede dudh ke dahi ke

आयुर्वेद वेदों की शाखा है, जो औषधीय जड़ी बूटियों का उपयोग करके स्वास्थ्य के विभिन्न समग्र पहलुओं के साथ संबंधित है | स्वास्थ्य का मतलब शरीर, मन और आध्यात्म से भी है |

हालांकि गौमूत्र को दवा के रूप में इस्तेमाल करना इसका प्रथम उपयोग है, इसे तीन या अधिक अमेरिकी पेटेंट दिए गए हैं: 5616593, 6410059 और 5972382| यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि भारत में कई लोगों ने भारतीय चिकित्सा की पारंपरिक प्रणाली में विश्वास खो दिया है, चूँकि अब पश्चिमी वैज्ञानिक समुदाय ने चिकित्सा में गौमूत्र की उपयोगिता को फिर से मानना शुरू किया है, तो अब हमारे देश के कुछ पश्चिम की तरफ देखने वाले लोग अपने स्वयं की चिकित्सा प्रणालियों की प्रभावकारिता पर आश्वस्त हो सकेंगे, व्यापक रूप से इसे स्वीकार करेंगे, इसे इस्तेमाल करेंगे और अपने स्वास्थ्य को सुधारने में इसका लाभ ले सकेंगे| पश्चिमी अनुसंधान से पता चला है कि गोमूत्र एंटीबायोटिक, रोगाणुरोधी, फंगसरोधी और तपेदिक विरोधी है| गौमूत्र अर्क गतिविधि बढ़ाने वाला और संक्रमण-विरोधी और कैंसर-विरोधी होने के साथ-साथ बायोएक्टिव अणुओं की उपलब्धता को सुविधाजनक बनाने वाला सिद्ध हो चुका है|

जालोर तथा बनासकांठा जिलों के गाँवो में तथा गोसेवा आश्रमों में प्रतिवर्श दस से बारह हजार गो वत्सों का पालन पोषण करके तैयार किया जाता है इनको पोष्टिक आहार, हरा-चारा, औषधि,स्नान, प्रेम आदि द्वारा पूर्ण देखभाल की जाती है तथा इनमें से विभिन्न गो प्रजातियों का चयन करके वर्गीकरण होता है। इन वर्गीकृत गो बछड़ियों को संवर्धन हेतु गांवो, घरों तथा आश्रमों में गोधाम महातीर्थ केवल प्रमाणिक सेवा एवं आजीवन संरक्षण की शर्त पर निःशुल्क वितरित करता है।
गो-परिचय
गाय सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी हैं यह बात शास्त्र कहते है तथा गाय की महत्ता,उपादेयता,आवश्यकता आध्यात्मिक,धार्मिक तथा वैज्ञानिक दृष्टि कोण से सर्वविदित है। इस बारे में खूब लिखा और कहा गया है तथा यह जानकारी सब को हैं। यहाँ केवल मैं व्यवहारिक रुप में जो हम प्रतिदिन गाय की सेवा करते हैं उस सम्बन्ध में कुछ आवश्यक बातें लिखने का प्रयास कर रहा हूँ जिससे गोवंश सुखपूर्वक रह सके और हमे भी ज्यादा से ज्यादा लाभ हो। बछड़े के जन्म से ही शुरु कर देते हैं –
(1) बछड़ा जब जन्म ले उस समय से उसकी पूरी देखभाल करें। गाय व्याहने के बाद जैसे ही बछड़ा खड़ा होने की कोशिश करे उस समय उसे पकड़ कर तुरन्त गाय के थन से लगावे और दूध पिलाये और दूध पिलाने से पूर्व गोमाता के चारो थनो में से थोड़ा-थोड़ा गूँता निकाल देवें बाद में बछड़े को थन मुँह में देवे। यदि जन्म के काफी समय के बाद भी बछड़ा खड़ा न होवे तो उसे हाथो से पकड़ कर थन मुँह में देना चाहिए और दूध पिलाना चाहिए। ध्यान रहे बछड़ा ज्यादा दूध न पिये। बाद में उसी बछड़े को नाप से ही दूध पिलावें। न भूखा रहे और न ही अधिक पिये। अधिक दूध पीने पर दस्त लग सकती है। जब बछड़ा 15 दिन का हो जावे,तब उसे आटे में नमक व हल्दी डालकर खिलाना शुरु करना चाहिए। बछड़े को कम से कम 3 माह तक पर्याप्त दूध मिलना चाहिए। गाय को दुहना छोड़ दे उस के बाद भी बछड़े को अच्छी प्रकार सम्भालना चाहिए। चारे के साथ साथ चूरी दाना,पौष्टिक आहार देना चाहिए। इससे बछड़ा जल्दी उपयोगी बनेगा। प्रायः लोग बछड़े को बिल्कुल ही दूध नहीं पिलाते हैं इस कारण बछड़े कुपोषण के शिकार होकर बड़ी मुश्किल से बड़े होते हैं और बहुत कमजोर हो जाते है। ऐसा होने से हानि हमको ही होती है। सेवा करने से 3 वर्ष की बछड़ी ब्याहती हैं। और कुपोषण की शिकार होने पर 5-6 साल में जाकर कही काम आती हैं।
(2) बछड़ो में अगर बछड़ी हो तो बड़ी होने पर सील में आने पर अच्छे नन्दी से गर्भाधान कराना चाहिए। जैसे तैसे नकारा नन्दी के सम्पर्क में नहीं आने देना चाहिए। ऐसा करने से आगे की नस्ल सुधर जाएगी । यदि बछड़ा हो तो छोटे समय में ही डाक्टर को बुलाकर उसे बैल बना देना चाहिए ताकी उसकी जिन्दगी बच सके। बैल न बनाकर वैसा ही नन्दी छोड़ देते हैं वो मारे-मारे भटकते है और दुःखी होते है। बैल किया हआहो तो बिक जाता है।
(3) व्याहने वाली गाय को व्याहने से पहले ही उसे बांधना,हाथ फेरना,पौष्टिक आहार देना आदि शुरु कर देना चाहिए। व्याहने के समय एक व्यक्ति को गाय के पास रहना चाहिए ताकी वो आराम से सेवा करने देती है वरना किसी को बाद में पास में नहीं आने देगी। घरों में इस बात का ध्यान रखतें है परन्तु गोशालाओं में ऐसा नहीं कर पाते हैं। इस कारण गाय और ग्वाले सबको बाद में बहुत समस्या का सामना करना पड़ता हैं। गाय मारती है। नजदीक नहीं आने देती है। प्रसव पीड़ा,रस्सा बाँधना,दुहना सब नया नया एक साथ होने से गाय भड़क जाती है जो बड़ी मुश्किल से धीरे-धीरे लाईन पर आती है। अतः हमे पहले से ही इसका ध्यान रखना चाहिए।
(4)गोमाता के व्याहने के बाद जब तक उसके मैली न गिरे तब तक उसके पास रहना चाहिये। कई गाये मैली गिरते ही एकदम वो खा लेती है। मैली खाना बहुत हानिकारक है अतः उसे गिरते ही वहाँ से उठाकर गड्डा खोदकर गाड़ देना चाहिये ताकि कुत्ते तंग न करें। यदि मैली नहीं गिरे तो पांच-छः सणियों की जड़ों को साफ घोकर उसके टुकड़े करके गुड़ के साथ पानी में उबाले। उसके बाद वह पानी दिन में दो बार तीन दिन तक गाय को पिलाने से मैली गिर जाती है।
(5)जब गाय के प्रसव का समय हो उसके तुरन्त पहले हो सके तो आधा किलो घी देना चाहिये ताकि प्रसव आराम से हो सके।10-15 दिन पूर्व 2-4 किलो घी पहले से ही दिया हुआ हो तो और भी अच्छा रहता है।
(6) व्याहने पर सबसे पहले खुराक में बाजरी देनी चाहिये। बाजरी पकाकर और कुत्तर में या जो भी चारा हो उस में मिला देना चाहिये।अकेली बाजरी नहीं खिलानी चाहिये। पहली बार थोड़ी बाजरी बिना पकाये दे सकते हैं। बाजरी भी थोड़ी थोड़ी दिन में 3-4 बार खिलाना चाहिये।एक साथ ज्यादा मात्रा में नहीं खिलाना चाहिये। बाजरा के साथ गुड़ व अजवायन भी दें सकते हैं। सप्ताह भर बाजरा देने के बाद फिर सुआवड़ शुरू करनी चाहिये। सुआवड़ में गेहू का भरड़ा,मैथी,गुड़,सुआ,माखनिया भाटा,खोपरे आदि देना चाहिये। ब्याहने के बाद 10-15 दिन तक हरा चारा नहीं देना चाहिये। व्याहने के बाद 2-3 दिन तक नवाया पानी पिलावे ज्यादा ठंडा न पिलावे। नवाये पानी से पूरे षरीर को साफ कर देना चाहिये।
(7) गाय के व्याहने के पूर्व अगर आर (गर्भाश्य बाहर आना) की शिकायत हो तो ब्याहने के बाद थोड़ी देर बैठने नहीं देना चाहिये। वरना सभी आँते बाहर आकर गाय की जान जा सकती है अगर व्याहने के बाद थोड़े दिनो में ही आयन कठोर हो जायें या थन में खून आवे तो डाक्टरको दिखाना चाहिए। तुरन्त ईलाज न होने पर थन जा सकता हैं।
(8) गोशाला मैं प्रायः बड़े बड़े बछड़े गायों के दूध पीते रहते हैं। दुह कर उन्हें अपनी माँ के साथ थोड़ी देर छोड़ देते है इस कारण वे बिना दूध ही अपनी मां को तंग करते है। अतः 5-6 महीने बाद बछड़ा दुबारा नहीं छोड़ना चाहिये । ऐसा करने पर उसके बहुत ही कम दूध होता हैं।
(9) प्रायः लोगों की शिकायत रहती हैं कि गाय मारती है, दुहने नहीं देती, बाँधने नहीं देती आदि। पहली बात तो यह है कि गाय के साथ कभी जोर जबरदस्ती नहीं करें और नहीं मारे-पीटे। उसे प्रेम से अपने वश में करें। सबसे सरल तरीका यह है कि आप उनके पास कुछ दूर बैठ जाएँ, फिर थोड़ा नजदीक आवें, फिर चले जावें, फिर आवें, फिर बैठें, फिर कुछ खिलावें। खिलाकर चले जावें । फिर आपके पास वो नजदीक आवे तो धीरे से हाथ फेरने की कोशिश करें और कुछ खिलावे। धीरे-धीरे विश्वास होने पर वो अपने आप आपके पास आयेगी या आप उसके पास जाओगे तो कोई प्रतिकार नहीं करेगी। कैसी भी खराब गाय हो, उसे धीरे-धीरे अपने वश में कर सकते है । हमेशा शरीर पर हाथ फैरना चाहिये और प्रेम से बुलाना चाहिये। ऐसा करेगें तो गाय आपके पीछे-पीछे फिरेगी।
(10) गाय कैसी भी सीधी और सरल हो तो भी दुहते समय हमेशा उसके नोजणा (पीछे के पैरो मे रसा बांधना) देकर ही दुहना चाहिये।
(11) गाय को दुहते समय पहले बछड़े को छोडें ,बछड़े को चाटकर जब गाय के थनों में पूरा दूध भर आवे तब उसे नोजणा (पीछे के पैरो मे रसा बांधना) दे, पहले न देवे। आगे वाँटा रखें और थोड़ी नजदीक से बांधे और बछड़े को पास में ही बांधे ताकि वह आराम से दूध देती है। बछड़ा पास में न हो और खाने को भी न हो तो दुहते समय वह इधर उधर सरकती हैं। अतः पहली बार से ही वैसी आदत डाले ताकि न दुहने देने की शिकायत कभी आवे ही नहीं। गाय के पास बछड़ा दुहते समय बांधने से बछड़ा भी जल्दी खाना खाना सीखता है। खाने के लिये वांटा रखकर दुहने से कभी बछड़ा मर जाये तो गाय बाँटे पर दुहने देती हैं।
(12)गाय को दुहने से पहले व बाद में थनांे को अच्छी प्रकार से धो लेना चाहिए।
(13) प्रायः लोग जब तक गाय दूध देती है तब तक अनाज चूरी या गोपौष्टिक आहार जो भी हो वो देते रहते हैं परन्तु जैसे ही दुहना बंद किया तो अनाज, चूरी बंद कर देतें हैं। ऐसा नहीं करना चाहिये। मात्रा थोड़ी कम कर सकते है पर बिल्कुल बन्द नहीं करना चाहिये। इससे गाय थक जाती है तथा आगे दूध पर भी असर पड़ता हैं। जब हम 2-3 महीनें गाय दुहना छोड़ देते हैं उस समय अच्छी खुराक मिलने से गााय की व्याहत में दूध अच्छा मिलता हैं।
(14)गोमाता को वांटे के साथ हमेशा थोड़-2 सेंधा नमक देते रहना चाहिये। स्वास्थ्य के लिये नमक अतिआवश्यक हैं।
(15) पुराने समय में तो चारागाह आदि सब सुविधा थी और लोग भी गायांे पर खूब ध्यान देते थे पर अब सबकी कार्य क्षमता घट गयी है। घरों में सर्दी,गर्मी,वर्षा आदि ऋतुओ के अनुसार गाय के रहने की सुविधा हम नहीं कर पा रहे हैं। बरसात के मौसम में जब तक बारिश होती रहती है तब तक गाय खड़ी रहती है बैठती नहीं है। वर्षात बन्द हो जाती है तो भी अगर गाय बन्धी रहती हैं, वहाँ पानी होगा तो गाय नहीं बैठेगी इस कारण वर्षात के मौसम में विशेष ध्यान रखना चाहिये और कीचड़ में और पानी में गाय को नहीं रखें साफ व सूखे स्थान पर बाँधे। हमेशा उसी स्थान पर न रखकर हेरा फेरी करते रहें और स्थान को सुखा कर ठीक करते रहे । तभी गाय रह पायेगी। वर्षा के मौसम में 2-3 दिन तक खड़े रहते गाय को मैने देखा है। कीचड़ से बाहर ले जाने पर ही गाय बैठी ऐसा प्रत्यक्ष कई बार देखा गया हैं। इसी प्रकार गर्मी व सर्दी में भी उचित व्यवस्था होनी चाहिये। जो गायें रात दिन बंधी रहती है उनको सर्दी के मौसम में दिन में एक बार धूप में अवश्य ले जाये गर्मी में छांया के हिसाब से हेरा फेरी करते रहें। वैसे भी दिन में व रात में रहने का स्थान अलग-अलग होना चाहिए। प्रायः कई गोशालाओ में देखा गया है कि बहुत ऊँची-2 दीवारें तथा रहने के लिये पक्के मकान तथा नीचे ईटें-पत्थर बिछा देते है एवं बहुत ही छोटे स्थान पर निर्धारित मात्रा से अधिक गायें रखते है और चारो ओर से बन्द होने से हवा प्रकाश नहीं आता है। गायो के लिये ऐसा जरूरी नहीं है और अनुकूल भी नहीं है। गायो को केवल सर्दी,गर्मी व वर्षा से थोड़ा बचाव होना चाहिये। बाकी स्थान खुला रहे। जहाँ दिन मे गाये रहती है वहाँ रात्रि में नहीं रह सकती और जहाँ रात्रि में रहती है वह स्थान दिन मे अनुकूल नहीं पड़ता है। जैसे पक्का कमरा है वहाँ छाया होने से दिन में तो गाय रह जायेगी पर रात्रि में वहाँ भंयकर गर्मी लगेगी। अतः गर्मी की रात्रि में बिल्कुल खुले स्थान मे रखना आवश्यक है। इसी प्रकार सर्दियो की रात्रि में कमरे में रह जाऐगी दिन में एक बार धूप में लाना अनिवार्य है उसी प्रकार बैठने का स्थान भी रेतीला हो जहाँ आराम से बैठ सके। पत्थर पर चैबीसो घंटे गाये को रखने से तकलीफ पाती है। अतः ऐसा हमें व्यावहारिक दृष्टि से सब देख कर रख रखाव व्यवस्था करनी चाहिये।
(16) जो क्षेत्र सिंचित है उस क्षेत्र के घरो में गायें हमेशा बंधी रहती है। वे छोड़ते नहीं है यह भी ठीक नहीं हैं। गाय के लिये फिरना भी आवश्यक हैं। बिना फिरे खुराक हजम नहीं होगी और चर्बी बढ जायगी। अतः खेत में जमीन थोड़ा थोड़ा हिस्सा गायो के लिये छोड़ें ताकि वहाँ चर-फिर सके। जमीन भी वो शुद्ध रहेगी और गायों को भी आराम रहेगा। जमीन की कमी है फिर भी चाहकर ऐसा करना चाहिए। गोशालाओ में जहाँ अधिक गायें होती है और खुली रहती है वहाँ सबको नहलाना सम्भव नहीं हो सकता हैं परन्तु घरो में जहाँ थोड़ी गाये है और बाधतें है उनको 15 दिन में एक बार गर्मियों के मौसम में सवेरे के समय (धूप निकलने से पहले) नहलाना चाहिये।
(17) गायो को चारा और दाना अनाज या गोपुष्टिक आहार जो भी हो सब उसकी क्षमता के अनुसार दें। आवश्यकता से अधिक मात्रा में भी न दें, वो खा तो जायेगी पर हजम नही होगा और हर समय चारा आगे पड़ा रहने से वो चारा भी कम खाएगी गोशालाओ में तो ऐसा करना सम्भव नहीं है पर घरो में यह कर सकते कि समय पर ही आवश्यकता के अनुसार चारा दें। व्यवस्थित और समय पर चारा पानी देने से गाय जल्दी ही स्वस्थ व हष्ट-पुष्ट बन जाती हैं।
(18) मारवाड़ी में कहावत हैं ‘‘ज्यादा खिलाकर प्राप्त किया जाता है और थोड़ा खिलाकर गवायाँ जाता है’’ अर्थात् जितना आवश्यक हों उतनी ही खुराक को देनी चाहिये तभी हमें दूध, घी,मखन आदि पर्याप्त मात्रा में मिलेगा अन्यथा थोड़ा खिलाते है तो कोई लाभ नहीं होता है। धन भी कमजोर रहता है और हमे भी प्रतिफल नहीं मिलता है।
(19) गाय के बारे में जब चर्चा होती है तो यह बात सामने आती है कि गाय दूध कम देती है। उसका मूल्य भी कम है। इस प्रकार आर्थिक दृष्टि से गाय पालना महंगा पड़ता है। दूसरी तरफ लोग भैसों को अच्छी तरह पालते है। यदि केवल आर्थिक पक्ष देखें तो भी गाय-भैंस से आगे रहती है। यदि आपके घर में बछड़ी बड़ी हुई है और सेवा की है तथा ब्याहने के बाद में अच्छी प्रकार सेवा करे तो भैस से कम खर्चें में भैस के बराबर दूध करती है। अन्तर यह रह जाता है कि जिस प्रकार बचपन से लेकर दूहने तक छोटी पाडी भैंस की बच्ची की हम सेवा करते है और आगे भी चराते है और दूध देना बन्द किया। तब भी चाकरी भैंस की करते है जबकि गाय को केवल दुहने के समय ही मामूली चराते है। यदि अच्छी प्रकार भैंस की तरह ही गाय की सेवा करें तो भैस से गाय का दूध ज्यादा ही होगा,कम नहीं होगा यह पक्की बात है या वैसे कर लो कि एक के खर्चे में दो गायें पल जायेगी और दो गायें मिलकर भैंस से आगे रहेगी।
गाय का मूल्य बढ़ाने और दूध बढ़ाने के लिये नस्ल सुधार करना आवश्यक है। लोगों ने वैसे ही आवारा नन्दी छोड़ दिये है। जिससे गायों का स्तर गिर गया है। इस कारण जिसके घर में संसाधन हो, पानी हो,जमीन हो, उनको अपने घर की गायों के लिये अच्छी नस्ल का सांड रखना चाहिये ताकि अपनी गायें सुधर जाय और गांव में दूसरी गायें भी सुधरें। अच्छी नस्ल के सांड की बछड़ी ब्याहेगी तो एक समय का 8-10 लीटर दूध करेगी। ऐसा कार्य कई स्थानों पर हो रहा है। हम खुद थरा (गुजरात) में देखकर आये हैं। वहाँ सभी गायें, बछड़े खूब सुन्दर है व दूध भी अच्छा है। उन्होंने नस्ल सुधार किया है। अपने यहाँ दाता में भाखरारामजी विश्नोई के खेत में वे स्वयं का अच्छा सांड रखते है वहाँ अन्य लोग भी गायें लेकर आते है। इससे कई गायों की नस्ल सुधर जायगी। जिस गाय के दूध अच्छा हो उस गाय का नन्दी बड़ा कर उसे गायों में रखना चाहियें। अगर हम सब वैसा करें और आवारा नन्दियों को बन्द कर दे तो आने वाली पीढ़ी पूरी सुधर जायेगी। तब गाय को अनुपयोगी मानकर कोई नहीं छोड़ेगा। गाय रहने के बाद नन्दी को कम से कम एक किलो गुड़ गाय मालिक द्वारा खिलाना चाहिये।
वैसे भी अब तो फेट पर भैंस से गाय के दूध का पैसा ज्यादा मिलता है इस प्रकार भैस के बराबर दूध की कीमत आ जाती है। इस कारण गायों की तरफ लोंगो का ध्यान जाने लगा है। गाय के दूध में फेंट कम होता है परन्तु दूसरे सभी आवश्यक तत्व होते है। केवल फेट वाला दूध शरीर के लिये उपयोगी नहीं है। शरीर के लिये सभी तत्वों की जरुरत है। गाय के दूध में सभी तत्व होते हैं जिससे शरीर स्वस्थ रहता है इस कारण भी भैस की बजाय गाय का दूध अधिक उपयोगी है। इसलिये ज्यादा पैसे देकर भी सदैव गाय का दूध ही खरीदना चाहिये।

हम अगर गोरस का बखान करते करते मर जाए तो भी कुछ अंग्रेजी सभ्यता वाले हमारी बात नहीं मानेगे क्योकि वे लोग तो हम लोगो को पिछड़ा, साम्प्रदायिक और गँवार जो समझते है| उनके लिए तो वही सही है जो पश्चिम कहे तो हम उन्ही के वैज्ञानिक शिरोविच की गोरस पर खोज लाये हैं जो रुसी वैज्ञानिक है|
गाय का घी और चावल की आहुती डालने से महत्वपूर्ण गैसे जैसे – एथिलीन ऑक्साइड,प्रोपिलीन ऑक्साइड,फॉर्मल्डीहाइड आदि उत्पन्न होती हैं । इथिलीन ऑक्साइड गैस आजकल सबसे अधिक
प्रयुक्त होनेवाली जीवाणुरोधक गैस है,जो शल्य-चिकित्सा (ऑपरेशन थियेटर) से लेकर जीवनरक्षक औषधियाँ बनाने तक में उपयोगी हैं । वैज्ञानिक प्रोपिलीन ऑक्साइड गैस को कृत्रिम वर्षो का आधार मानते है । आयुर्वेद विशेषज्ञो के अनुसार अनिद्रा का रोगी शाम को दोनों नथुनो में गाय के घी की दो – दो बूंद डाले और रात को नाभि और पैर के तलुओ में गौघृत लगाकर लेट
जाय तो उसे प्रगाढ़ निद्रा आ जायेगी ।
गौघृत में मनुष्य – शरीर में पहुंचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता हैं । अग्नि में गाय का घी कि आहुति देने से उसका धुआँ जहाँ तक फैलता है,वहाँ तक का
सारा वातावरण प्रदूषण और आण्विक विकरणों से मुक्त हो जाता हैं । सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक चम्मच गौघृत को अग्नि में डालने से एक टन प्राणवायु (ऑक्सीजन) बनती हैं जो
अन्य किसी भी उपाय से संभव नहीं हैं|

देसी गाय के घी को रसायन कहा गया है। जो जवानी को कायम रखते हुए, बुढ़ापे को दूर रखता है। काली गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है।गाय के घी में स्वर्ण छार पाए जाते हैं जिसमे अदभुत औषधिय गुण होते है, जो की गाय के घी के इलावा अन्य घी में नहीं मिलते । गाय के घी से बेहतर कोई दूसरी चीज नहीं है। गाय के घी में वैक्सीन एसिड, ब्यूट्रिक एसिड, बीटा-कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्रींस मौजूद होते हैं। जिस के सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है। गाय के घी से उत्पन्न शरीर के माइक्रोन्यूट्रींस में कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की क्षमता होती है।

यदि आप गाय के 10 ग्राम घी से हवन अनुष्ठान (यज्ञ,) करते हैं तो इसके परिणाम स्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजा ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने कि तथा , धार्मिक समारोह में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित है। इससे वातावरण में फैले परमाणु विकिरणों को हटाने की अदभुत क्षमता होती है।

गाय के घी के अन्य महत्वपूर्ण उपयोग :–
1.गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।
2.गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है।
3.गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।
4.20-25 ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है।
5.गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है।
6.नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तारो ताजा हो जाता है।
7.गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बहार निकल कर चेतना वापस लोट आती है।
8.गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है।
9.गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।
10.हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ढीक होता है।
11.हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी।
12.गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।
13.गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है
14.गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है।
15.अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।
16.हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा।
17.गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।
18.जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है।
19.देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।
20.संभोग के बाद कमजोरी आने पर एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर पी लें। इससे थकान बिल्कुल कम हो जाएगी।
21.फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।गाय के घी की झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है।
22.सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।
23.दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ढीक होता है। सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा।
24.यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है । यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।
25.एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।
26.गाय के घी को ठन्डे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक मलहम कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है।
27.गाय का घी एक अच्छा(LDL)कोलेस्ट्रॉल है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार,नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है।
28.घी, छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा कुनकुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता 

एडी से चोटी तक शरीर की ब्लाक नसों को खोले

एडी से चोटी तक शरीर की ब्लाक नसों को खोले –

ज़रूरी सामान


1gm दाल चीनी
10 gm काली मिर्च साबुत
10gm तेज पत्ता
10gm मगज
10 gm मिश्री डला
10 gm अखरोट गिरी
10gm अलसी
टोटल 61gm सभी सामान रसोई का ही है
बनाने की विधि

सभी को मिक्सी में पीस के बिलकुल पाउडर बना ले और 6gm की 10 पुड़िया बन जायेगी
एक पुड़िया हर रोज सुबह खाली पेट नवाये पानी से लेनी है और एक घंटे तक कुछ भी नही खाना है चाय पी सकते हो ऐड़ी से ले कर चोटी तक की कोई भी नस बन्द हो खुल जाएगी हार्ट पेसेंट भी ध्यान दे ये खुराक लेते रहो पूरी जिंदगी हार्टअटैक या लकवा से नही मरेगा गारंटीड।

अखरोट के फायदें...

कई लोगों को अखरोट खाना बहुत पंसद होता है। अखरोट हमारी
स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद भी है। एक तरह यह
हमारी फिटनेस बरकरार रखता है वहीं यह हमें
गंभीर बीमारियों से भी बचाता है। आज हम
आपको बताते है अखरोट के फायदें...
1. पौष्टिकता से भरा
नट्स में वसा की मात्रा अधिक मानी जाती है
और इसलिए इन्हें वजन बढ़ाने वाला माना जाता है। लेकिन अखरोट एक ऐसा ‘नट’
है। इसमें कई पौष्टिक तत्व होते हैं।
2. वजन घटाए
वजन कम करने में अखरोट मदद करता है। एक औंस यानी
करीब 28 ग्राम अखरोट में 2.5 ग्राम ओमेगा थ्री
फैटी एसिड, 4 ग्राम प्रोटीन और 2 ग्राम फाइबर होता है
जिससे लंबे समय तक तृप्ति की भावना बनी
रहती है। वजन कम करने के लिए जरूरी है कि आपका
पेट भरा रहे।
3. नींद
नट्स आपकी नींद सुधार सकते हैं इनमें मेलाटोनिन हॉरमोन
होता है, जो नींद के लिए प्रेरित करना और नींद को नियंत्रित
करता है। अगर आप सोने से पहले अखरोट खाए तो इससे आपकी
नींद में सुधार आए।
4. बालों के लिए फायदेमंद
बालों के लिए भी अखरोट फायदेमंद होता है। अखरोट में मौजूद विटामिन
बी7 होता है जो आपके बालों को मजबूत बनाने का काम करता है।
5. दिल की बीमारियां
अखरोट में एंटी-ऑक्सीडेंट्स और ओमेगा थ्री
फैटी एसिड भरपूर मात्रा में होता है, जो इसे दिल की
बीमारियों से लड़ने में काफी असरदार बनाता है। इसके साथ
ही यह बुरे कोलेस्ट्रॉल को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल में
इजाफा करने का भी काम करता है, जो इसे आपके दिल के लिए और
भी उपयोगी बनाता है।
6. डायबिटीज
एक शोध के मुताबिक जो महिलायें सप्ताह में 2 बार 28 ग्राम अखरोट
खाती हैं। उन्हें टाइप टू डायबिटीज होने का खतरा 24
फीसदी कम होता है। जर्नल ऑफ न्यूट्रीशन
में प्रकाशित इस शोध में यह भी कहा गया कि हालांकि यह शोध
महिलाओं पर किया गया था लेकिन विशेषज्ञों का यह मानना है कि पुरुषों को
भी अखरोट के इसी प्रकार के लाभ मिलने की
उम्मीद है।
7. शुक्राणु की गुणवत्ता बढ़ाए
रोज 2.5 औंस यानी करीब 75 ग्राम अखरोट रोजाना खाने से
स्वस्थ युवा पुरुषों के शुक्राणुओं की गुणवत्ता में सुधार होता है।
यूसीएल के शोधकर्ताओं का कहना है कि रोजाना अखरोट का पर्याप्त
सेवन करने से 21 से 35 वर्ष की आयु के पुरुषों के शुक्राणुओं में
अधिक जीवनशक्ति और गतिशीलता आती है।
8. त्वचा
चमकदार त्वचा पाने के लिए आप अखरोट का सेवन कर सकती है।
अखरोट में विटामिन- बी और एंटी-ऑक्सीडेंट्स
भरपूर मात्रा में होते हैं, जो आपकी त्वचा को फ्री-
रेडिकल्स से बचाते हैं। इससे आपकी त्वचा को उम्र के निशान और
झुर्रियों के प्रभाव से भी बचाया जा सकता है।
9. डिमेंशिया
रोजाना अखरोट का सेवन आपको डिमेंशिया से दूर रखने में मदद करता है। शोध के
मुताबिक अखरोट में मौजूद विटामिन ई और फ्लेवनॉयड डिमेंशिया उत्पन्न करने वाले
हानिकारक फ्री-रेडिकल्स को नष्ट करने में मदद करते हैं। इसके साथ
ही अखरोट सीखने की क्षमता को
भी बढ़ाता है।
10. गर्भवती महिलाओं के लिए फायदेमंद
गर्भवती महिलाएं जो अखरोट जैसे फैटी एसिड युक्त
आहार का सेवन करती हैं। उनके बच्चों को फूड एलर्जी
होने की आशंका बहुत कम होती है। शोधकर्ताओं का
कहना है कि मांओं के आहार में पॉलीअनसेचुरेटेड फैटी
एसिड (पूफा) होता है। उनके बच्चे का विकास अच्छी तरह होता है।
पूफा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली कोशिकाओं को मजबूत बनाता है।
11. स्तन कैंसर
मार्शल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया रोजाना दो औंस
यानी करीब 56 ग्राम अखरोट का सेवन स्तन कैंसर से
बचाने में मदद करता है। रोजाना अखरोट का सेवन करने वालों को स्तन कैंसर का
खतरा काफी कम होता है।
12. तनाव
अखरोट अथवा उसके तेल को आहार में शामिल करने से तनाव के लिए जिम्मेदार
रक्तचाप को दूर करने में मदद मिलती है। अखरोट में फाइबर,
एंटी-ऑक्सीडेंट्स और असंतृप्त फैटी एसिड
विशेषकर अल्फा लिनोलेनिक एसिड और ओमेगा थ्री फैटी
एसिड मौजूद होते हैं।

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*1. सुबह उठ कर कैसा पानी पीना चाहिए*

    उत्तर -     हल्का गर्म

*2.  पानी पीने का क्या तरीका होता है*

    उत्तर -    सिप सिप करके व नीचे बैठ कर

*3. खाना कितनी बार चबाना चाहिए*

     उत्तर. -    32 बार

*4.  पेट भर कर खाना कब खाना चाहिए*

     उत्तर. -     सुबह

*5.  सुबह का नाश्ता कब तक खा लेना चाहिए*

     उत्तर. -    सूरज निकलने के ढाई घण्टे तक

*6.  सुबह खाने के साथ क्या पीना चाहिए*
   
     उत्तर. -     जूस

*7.  दोपहर को खाने के साथ क्या पीना चाहिए*

    उत्तर. -     लस्सी / छाछ

*8.  रात को खाने के साथ क्या पीना चाहिए*

    उत्तर. -     दूध

*9.  खट्टे फल किस समय नही खाने चाहिए*

    उत्तर. -     रात को

*10. आईसक्रीम कब खानी चाहिए*

       उत्तर. -      कभी नही

*11. फ्रिज़ से निकाली हुई चीज कितनी देर बाद*
      *खानी चाहिए*

      उत्तर. -    1 घण्टे बाद

*12. क्या कोल्ड ड्रिंक पीना चाहिए*

       उत्तर. -      नहीं

*13.  बना हुआ खाना कितनी देर बाद तक खा*
      *लेना चाहिए*

      उत्तर. -     40 मिनट

*14.  रात को कितना खाना खाना चाहिए*

       उत्तर. -    न के बराबर

*15.  रात का खाना किस समय कर लेना चाहिए*

      उत्तर. -     सूरज छिपने से पहले

*16. पानी खाना खाने से कितने समय पहले*
     *पी सकते हैं*

      उत्तर. -     48 मिनट

*17.  क्या रात को लस्सी पी सकते हैं*

     उत्तर. -     नही

*18.  सुबह खाने के बाद क्या करना चाहिए*

       उत्तर. -     काम

*19. दोपहर को खाना खाने के बाद क्या करना*
       *चाहिए*

       उत्तर. -     आराम

*20. रात को खाना खाने के बाद क्या करना*
     *चाहिए*

      उत्तर. -    500 कदम चलना चाहिए

*21. खाना खाने के बाद हमेशा क्या करना*
      चाहिए

      उत्तर. -     वज्रासन

*22. खाना खाने के बाद वज्रासन कितनी देर*
      *करना चाहिए.*
   
      उत्तर. -     5 -10 मिनट

*23.  सुबह उठ कर आखों मे क्या डालना चाहिए*

      उत्तर. -     मुंह की लार

*24.  रात को किस समय तक सो जाना चाहिए*

      उत्तर. -     9 - 10 बजे तक

*25. तीन जहर के नाम बताओ*

      उत्तर.-    चीनी , मैदा , सफेद नमक

*26. दोपहर को सब्जी मे क्या डाल कर खाना*
      *चाहिए*

      उत्तर. -     अजवायन

*27.  क्या रात को सलाद खानी चाहिए*

      उत्तर. -     नहीं

*28. खाना हमेशा कैसे खाना चाहिए*

      उत्तर. -     नीचे बैठकर व खूब चबाकर

*29. चाय कब पीनी चाहिए*

      उत्तर. -     कभी नहीं

*30. दूध मे क्या डाल कर पीना चाहिए*

      उत्तर. -    हल्दी

*31.  दूध में हल्दी डालकर क्यों पीनी चाहिए*

      उत्तर. -    कैंसर ना हो इसलिए

*32. कौन सी चिकित्सा पद्धति ठीक है*

      उत्तर. -   आयुर्वेद

*33. सोने के बर्तन का पानी कब पीना चाहिए*

      उत्तर. -   अक्टूबर से मार्च (सर्दियों मे)

*34. ताम्बे के बर्तन का पानी कब पीना चाहिए*

      उत्तर. -    जून से सितम्बर(वर्षा ऋतु)

*35. मिट्टी के घड़े का पानी कब पीना चाहिए*

      उत्तर. -  मार्च से जून (गर्मियों में)

*36. सुबह का पानी कितना पीना चाहिए*

      उत्तर. -  कम से कम 2 - 3 गिलास

*37. सुबह कब उठना चाहिए*

       उत्तर. -  सूरज निकलने से डेढ़ घण्टा पहल

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हाथ की पांच उंगलिया

हाथ की पांच उंगलिया

हमारे हाथ की पांचो उंगलिया शरीर के अलग अलग अंगों से जुडी होती है | इसका मतलब आप को दर्द नाशक दवाइयां खाने की बजाए इस आसान और प्रभावशाली  तरीके का इस्तेमाल करना करना चाहिए | आज इस लेख के माध्यम  से हम आपको बतायेगे के शरीर के किसी हिस्से का दर्द सिर्फ हाथ की उंगली को रगड़ने से कैसे दूर होता है |

हमारे हाथ की अलग अलग उंगलिया अलग अलग बिमारिओ और भावनाओं से जुडी होती है | शायद आप को पता न हो, हमारे हाथ की उंगलिया चिंता, डर और चिड़चिड़ापन दूर करने की क्षमता रखती है | उंगलियों पर धीरे से दबाव डालने से शरीर के कई अंगो पर प्रभाव पड़ेगा |

1. अंगूठा
– The Thumb
हाथ का अंगूठा हमारे फेफड़ो से जुड़ा होता है | अगर आप की दिल की धड़कन तेज है तो हलके हाथो से अंगूठे पर मसाज करे और हल्का सा खिचे | इससे आप को आराम मिलेगा |

2. तर्जनी
– The Index Finger
ये उंगली आंतों  gastro intestinal tract से जुडी होती है | अगर आप के पेट में दर्द है तो इस उंगली को हल्का सा रगड़े , दर्द गयब हो जायेगा।

3. बीच की उंगली
– The Middle Finger
ये उंगली परिसंचरण तंत्र तथा circulation system से जुडी होती है | अगर आप को चक्कर या  आपका जी घबरा रहा है तो इस उंगली पर मालिश करने से तुरंत रहत मिलेगी |

4. तीसरी उंगली
– The Ring Finger
ये उंगली आपकी मनोदशा से जुडी होती है | अगर किसी कर्ण आपका मनोदशा अच्छा नहीं है या शांति चाहते हो तो इस उंगली को हल्का सा मसाज करे और खिचे, आपको जल्द ही इस के अच्छे नतीजे प्राप्त हो जयेगे, आप का मूड खिल उठे गा।

5. छोटी उंगली
– The Little Finger
छोटी उंगली का किडनी और सिर के साथ सम्बन्ध होता है | अगर आप को सिर में दर्द है तो इस उंगली को हल्का सा दबाये और मसाज करे, आप का सिर दर्द गायब हो जायेगा | इसे मसाज करने से किडनी भी तंदरुस्त रहती  है |

पोस्ट अच्छी लगे तो कम से कम अपने मित्रो और परिचित तक भेजे और स्वस्थ भारत के निर्माण मैं अपना पूर्ण योगदान दे।

🌸 धन्यवाद 🌸